⚖️ न्यायपालिका का कुरूप चेहरा और इंसाफ़ की मौत
भारत जैसे देश में, जहाँ संविधान की बुनियाद समानता, आज़ादी और न्याय के उसूलों पर रखी गई थी, आज वही न्यायपालिका सत्ता-प्रेम और बहुसंख्यकवाद की गिरफ़्त में नज़र आती है।
जो अदालतें कभी उम्मीद और इंसाफ़ की प्रतीक थीं, वे अब सत्ताधारी दल और आरएसएस की विचारधारा के लिए काम करने वाले औज़ार बन चुकी हैं।
यही वह सच्चाई है जिसे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ؒ ने बहुत पहले महसूस कर कहा था —
“अदालतें हुकूमत का सबसे बड़ा हथियार होती हैं।”
पिछले कुछ वर्षों में अदालतों के कई फ़ैसले खुलकर बहुसंख्यक भावनाओं के पक्ष में गए हैं।
मॉब लिंचिंग के अभियुक्त बरी किए गए, बुलडोज़र एक्शन को क़ानूनी जामा पहनाया गया,
सीएए, एनआरसी, बाबरी मस्जिद, दिल्ली दंगे और शरजील इमाम, उमर खालिद, खालिद सैफ़ी, मीरान हैदर जैसे क़ैदियों के मामलों में अनावश्यक देरी की गई।
हर बार न्यायपालिका ने अपनी निष्पक्षता खोई और ज़ुल्म के साथ खड़ी दिखी।
न्याय का पलड़ा जब सत्ताधारी और बहुसंख्यक समाज के पक्ष में झुक जाता है, तो अदालतें “इंसाफ़ की जगह डर” का प्रतीक बन जाती हैं।
आज भारत का ग़रीब और अल्पसंख्यक तबक़ा अदालत का नाम सुनते ही उम्मीद नहीं, बल्कि बेबसी महसूस करता है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने की घटना
यह घटना किसी एक व्यक्ति की सनक नहीं, बल्कि उस सामूहिक आक्रोश की प्रतीक है जो जनता न्यायपालिका के रवैये से महसूस कर रही है।
जब अदालतें बरसों तक न्याय के तराज़ू को एक ही ओर झुकाए रखें,
जब वे बहुसंख्यक दबाव के आगे झुक जाएँ,
जब वे पीड़ितों की पुकार को सुनने से इंकार कर दें —
तो नतीजा यही होता है कि वही बहुसंख्यक वर्ग,
जिसे खुश रखने के लिए अदालतों ने संविधान की बलि दी,
अब उन्हीं पर जूते फेंकने लगा।
हम इस हरकत की सख्त निंदा करते हैं,
लेकिन सच्चाई यह है कि अगर अदालतें शुरू से अपने ओहदे की गरिमा और निष्पक्षता बचाए रखतीं,
तो आज यह नौबत ही न आती।
जब इंसाफ़ बिकता है — तब हमला सिर्फ़ शरीर पर नहीं होता, बल्कि जनता के भरोसे पर होता है।
असली संकट: इंसाफ़ नहीं, बहुसंख्यक संतुष्टि है
आज भारत का सबसे बड़ा संकट यह है कि न्याय अब “बहुसंख्यक संतोष” का औज़ार बन गया है।
सरकारी एजेंसियों से लेकर अदालतों तक,
हर संस्थान वोट बैंक को खुश करने के लिए अल्पसंख्यकों पर अत्याचार कर रहा है।
देश की शिक्षा, अर्थव्यवस्था और रोज़गार की हालत बदतर है,
लेकिन मीडिया और न्यायपालिका जनता का ध्यान इन मुद्दों से हटाकर धर्म और नफ़रत की राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं।
नतीजा यह है कि देश गृहयुद्ध जैसी अराजकता के कगार पर खड़ा है।
बहुसंख्यक वर्ग का सेक्युलर तबक़ा या तो चुप है या डर में है,
जबकि हिंदुत्व के अनुयायी अपनी अंधभक्ति में संविधान, इंसानियत और धर्म की हर हद पार कर चुके हैं।
मुस्लिम नेतृत्व की ज़िम्मेदारी
इन हालात में मुस्लिम क़ायदीन, संगठनों और उलमा पर असाधारण ज़िम्मेदारी है।
सिर्फ़ तक़रीरों और आपसी मतभेदों में उलझे रहने से उम्मत की सूरत नहीं बदलेगी।
अब वक्त है कि उम्मत-ए-वाहिदा के रूप में एकजुट होकर,
विचार, नीति और रणनीति से इस अत्याचार का मुक़ाबला किया जाए।
मौलाना तौक़ीर रज़ा साहब की गिरफ़्तारी इसका जीता-जागता सबूत है
कि हुकूमत को न किसी मज़हबी फ़र्क से मतलब है, न किसी मज़हबी पहचान से —
उसे बस “ला इलाहा इल्लल्लाह” कहने वालों से दुश्मनी है।
असल संघर्ष अब इस्लामी एकता और दैविक मनुस्मृति आधारित हिंदुत्व शासन के बीच है।
अगर आज भी बरेलवी, देवबंदी, सूफ़ी या अहले-हदीस अपने अपने दायरे में सिमटे रह गए,
तो इतिहास स्पेन और यूरोप के मुस्लिम पतन की कहानी दोहराएगा।
ज़ालिम का अंजाम हमेशा एक जैसा होता है
यह इतिहास का अटल नियम है —
जब ज़ुल्म अपनी हद पार कर जाता है, तो उसका पतन दरवाज़े पर खड़ा होता है।
क़ुरआन कहता है:
> “وَتِلْكَ الْأَيَّامُ نُدَاوِلُهَا بَيْنَ النَّاسِ”
(ये दिन हैं जिन्हें हम लोगों के बीच फेरते रहते हैं।) [आल-ए-इमरान:140]
फ़िरऔन का अंत समुंदर में हुआ,
नमरूद को एक मच्छर ने मारा,
और आज की हिंदुत्व शक्तियाँ भी अपने पतन की दहलीज़ पर खड़ी हैं।
अल्लाह की पकड़ आती है — देर से सही, पर बहुत सख्त।
क़ारी मुमताज़ अहमद जामई
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